रघुवीर सहाय की कविता की राजनैतिक चेतना का विश्लेषण

 

डॉ. अमिय कुमार साहु

एसोसिएट प्रोफेसर (हिन्दी) एवं प्रमुख, भाषा संकाय, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला, पुणे-411023

*Corresponding Author E-mail: amiyaks@yahoo.com

 

ABSTRACT:

रघुवीर सहाय सठोत्तरी कविता के बहुत बड़े कवि रहे हैं। जो जितना बड़ा कवि होता है; उसकी आलोचना भी उतनी ही होती है। रघुवीर सहाय की कविता-यात्रा के दौर में और बाद में भी, विभिन्न विषयों को लेकर विभिन्न आलोचकों ने उन पर अलग-अलग आरोप लगाते आए हैं। रघुवीर सहाय की प्रतिबद्धता जनता के प्रति थी और वे जनता को आगे बढ़ाने के लिए, एक विकल्प संसार गढ़ने के लिए, जनता को समझ देने के लिए कभी कभी उन पर प्रहार भी करते दिखाई देते हैं। जनता की इस आलोचना को, प्रहार को आलोचक उनकी नाकामी सिद्ध करते हुए उनकी कविता को खीझ और झुंझलाहट से भरी मानकर, नकार देते हैं। ऐसे करने वाले उनकी खीझ और झुंझलाहट के पीछे  की राजनीति को समझ नहीं पाते। रघुवीर सहाय की कविता की राजनीति को समझना और साधारण राजनीति या दलीय राजनीति से यह किस प्रकार अलग है, इसका विश्लेषण करना इस शोध-लेख का उद्देश्य है।

 

KEYWORDS:  राजनीति, चेतना, विचारधारा, साठोत्तरी कविता

 

 


प्रस्तावना %&

समय और समाज की विडंबना यह है कि जब कभी किसी समाज में किसी समय कुछ नया होता है; कुछ लीक से हटकर होता है; पुराने ढर्रे से कुछ अलग होता है तो उसका विरोध अवश्य होता है। या तो इसके विरोध करने वाले को नया बनना पसंद नहीं आता या इसमें वह निजी अस्तित्व के प्रति खतरा महसूस करता है।

 

ऐसा सिर्फ समाज में नहीं साहित्य में अक्सर हुआ करता है। छायावादी युग में जब सभी एक ही लीक पर चल रहे थे तब निराला ने मुक्त छंद की घोषणा की और उनका जमकर विरोध हुआ। वस्तु के क्षेत्र में निराला ने कुकुरमुत्ताके द्वारा पुराने ढर्रे से अलग हटकर कुछ नया सृजन किया और उसका भी विरोध हुआ। नई-कविता के दौर में मुक्तिबोध ने भी वस्तु के स्तर पर बहुत कुछ नया करने की कोशिश की, उनका भी जमकर विरोध हुआ। यहां तक कि उन्हें कवि की मान्यता नहीं दी गयी। साठोत्तरी कविता के दौर में भी रघुवीर सहाय का विरोध हुआ जिन्होंने वस्तु को थोड़ा, साथ साथ भाषा को भी। इनका विरोध विभिन्न प्रकार से हुआ, जैसे वे शब्दों के साथ खिलवाड़ करते हैं, उनकी कविता में एक विकल्प हीनता का संसार है, लोगों पर क्रोध है, नाकामी और निराशा का वर्णन है, उनमें संघर्ष का अभाव है आदि आदि। उपरोक्त आरोप कहां तक सच हैं और अगर उन्होंने ऐसा कुछ किया है तो क्यों किया है, इसकी छानबीन जरूरी जान पड़ती है।

 

रघुवीर सहाय की राजनैतिक चेतना

रघुवीर सहाय की राजनीति क्या थी, जीवन को समझने की; इसे पहले जानना जरुरी है। जब हम किसी कवि की पॉलिटिक्सकी बात करते हैं तो यह बिल्कुल उस पॉलिटिक्ससे अलग होटी है, जिसका हम साधारण अर्थ में व्यवहार करते हैं; जिसे दलीय, संगठित राजनीति कह सकते हैं, जो किसी दल का घोषणा-पत्र मात्र होती है। रघुवीर सहाय की राजनीति का संबंध दलीय राजनीति से एकदम नहीं है। वे इस दलीय राजनीति, जिससे वे प्रभावित भी थे; जिसमें एक क्रूर विचारधारा होती है; के विरोधी थे। इसका कारण यह था कि वे हर विचारधारा को रचना की स्वतंत्रता के खिलाफ पाते हैं। अर्थात वे किसी भी विचारधारा को गिलाफ की तरह चढ़ाना नहीं चाहते थे। उन्होंने लिखा है मार्क्सवाद को कविता पर गिलाफ की तरह चढ़ाया नहीं जा सकता। उसके लिए मध्यवर्गीय धोखा खाते रहने वाले ढुलमुल यकीन को, अपनी बौद्धिक चेतना को जागरुक रखना पड़ेगा और बराबर जागरुक रहकर एक दृष्टिकोण बनाना होगा। यह दृष्टिकोण सामाजिक, वास्तविक, साम्यवादी और इसलिए सही और स्वस्थ होगा। तभी कविता में जान और माने पैदा होंगे”।1 वे एक विचारधारा को बार-बार जांच परीक्षण कर उसे नया रूप देना चाहते थे; उसे उसी रुप में स्वीकार नहीं करते थे। उनके अनुसार कोई भी विचारधारा बुद्धि का ह्रास करती है और भाषा को पारिभाषिक शब्दावली बनाती है। उन्होंने विचारवस्तु को कविता में खून की तरह दौड़ने की बात कही है,2 विचारधारा को नहीं; क्योंकि विचारधारा उनके अनुसार एक व्यवस्था का रू ले लेती है जिसका लक्षण है एकांगीता, गतिहीनता और अंततः मानव विरोध। वे हर विचारधारा का विरोध करते रहे। यहां यह सवाल उठता है कि क्या साहित्य रचना के लिए किसी विचारधारा की आवश्यकता होती है? इसका उत्तर यह अवश्य होना चाहिए कि सच्चा साहित्य किसी भी विचारधारा का पिछलग्गू नहीं होता। वह विचार की उपज है, किसी विचारधारा का नहीं। यह विचार हमेशा स्वतंत्र और मुक्त होता है और बार-बार उसका कायाकल्प होता रहता है। स्वतंत्र विचार कभी भी दलीय राजनीति से संबंध नहीं रखते, ये कवि की अपनी राजनीति से संबंध रखते हैं। इसलिए दलीय राजनीति या संगठित राजनीति और कवि की अपनी राजनीति में बहुत बड़ा अंतर होता है। रघुवीर सहाय लिखते हैं “अंतर है संगठित राजनीति में और राजनीति में। आप जिस समय पैदा होते हैं, आप समाज में पैदा कर दिए जाते हैं और आपका हक, हवा, पानी, जमीन और जमीन के नीचे जो है और दुनिया में जो चीजें अब खोजी जाएंगी, जिन्हे इंसान खोजेंगे, उनके ऊपर होता है- इसलिए कि आप भी इंसान हैं। यह आपका राजनैतिक अधिकार है। इस राजनैतिक अधिकार के अनेक उपयोग हैं और उन उपयोग को ही आप ही कर सकते हैं। करते हैं - अपने हर रचनात्मक काम के द्वारा। इस अर्थ में आप राजनैतिक हैं क्योंकि आप राजनैतिक नहीं होंगे तो आप अपने इन अधिकारों के बारे में सचेत नहीं होंगे। अधिकारों को शोषोकों के लिए छोड़ देने को तैयार होंगे3

 

कुल मिलाकर रघुवीर सहाय के अनुसार राजनीति का अर्थ है; अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहना और उसके लिए कर्म करते जाना। रघुवीर सहाय लोहिया से भी बहुत ही प्रभावित थे क्योंकि लोहिया भी राजनीति का ऐसा ही कुछ अर्थ लगाते हैं। बक़ौल राममनोहर लोहिया “राजनीति का मतलब है अपने अस्तित्व, अपनी मर्यादा और अपनी रचनात्मकता के लिए अधिकार को प्राप्त करना”।4 जब इस अधिकार की बात की जाती है तो इसका मतलब नौकरी, कुर्सी, इज्जत, पैसा, नेता बनने, संसद के सदस्य बनने से नहीं है। इस राजनैतिक अधिकारों को परिभाषित करते हुए रघुवीर सहाय लोथार लुत्से के साथ एक साक्षात्कार में लिखते हैं “मेरे लिए सही राजनीति उतना ही अर्थ रखती है जितना मेरे लिए एक कविता या मेरा एक गाना या मेरा एक गाना सुनना, मेरा एक अच्छा नाटक देखना या एक अच्छी फिल्म देखना या अच्छा चित्र देखना या कि बनाना- अगर मैं बना पाऊं तो। राजनीति का यह मतलब है बहुत बड़ा। आदमी के अस्तित्व में और उसकी रचनात्मकता के साथ, उसके अस्तित्व में उसकी आत्मा, उसकी शक्ति का स्वीकार और उसकी उपलब्धि करना, उपलब्ध कराना - ये राजनीति है”।5 उनकी जो राजनीति है, उसका अर्थ हुआ कवि के जीवन में जो अधिकार है, जो आस्था है, शक्ति है; उसे बचाए रखना और रचनात्मकता के द्वारा दूसरों में इनको बनाए रखना। यही है उनकी राजनीति। इससे यह मतलब नहीं लेना चाहिए कि वह संगठित राजनीति के एकदम खिलाफ थे। वे वहीं तक उसके साथ रहते हैं जहां तक वह जनता की स्वतंत्रता की बात करती है। परंतु जहां यह इस मुद्दे से अलग हो जाती है, वहाँ उनका उससे छत्तीस का संबंध हो जाता है। इस प्रकार उनकी राजनीति वह है जो अपने अधिकार के लिए, उसके ज्ञान के लिए और दूसरों के अधिकार के लिए लड़ती है।

 

अब उनकी राजनीति को समझ लेने के बाद उनके ऊपर लगाए गए आरोप कहां तक सच हैं, कहां तक नहीं यह परखना संगत होगा। उनकी कविताओं पर पहला आरोप यह है कि उनमें संघर्ष का अभाव है। रघुवीर सहाय की कविता को सिर्फ एक खबर मानते हुए एक आलोचक उनमें संघर्ष का अभाव देखते हैं। बकौल जीवन सिंह “खबरें पाठक को क्षणिक विचलित व उद्वेलित करती हैं लेकिन उनकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि खबरों के पीछे रहने वाले संघर्ष को वह विस्मृत किए रहती हैं”।6 इस आलोचक ने रघुवीर सहाय में वृथा भावुकता न होने को सराहा तो है पर आगे नागार्जुन के साथ तुलना करते हुए उन्होंने रघुवीर सहाय की यह सीमा बताई है कि इनमें शक्ति संपन्न भावुकता नहीं है।

 

इस तरह के आरोप को देखते हुए साहित्य के कर्म पर थोड़ी सी चर्चा कर लेना संगत होगा। साहित्य किस लिए? क्यों? क्या साहित्य का कर्म, जनता को संघर्षशील और शक्ति संपन्न बता देने से ही खत्म हो जाता है? क्या इससे सचमुच जनता शक्तिशाली बन जाती है? अगर जनता ऐसी है तो साहित्य की क्या जरूरत। साहित्य का काम जनता को संघर्षशील, शक्ति संपन्न बता देने से खत्म नहीं हो जाता, सच तो यह है कि ना जनता शक्ति संपन्न होती है, ना संघर्षशील। हां, यह जरूर है कि उसमें यह गुण सुप्त रूप से विद्यमान रहते हैं। अतः यह जरूरी है कि उसके अंदर की जो सुप्त शक्ति है, उसे जागृत किया जाए। उसके अंदर की छिन्न-भिन्न ऊर्जा को एकत्रित किया जाए। यही कर्म साहित्य का होता है; साहित्यकार का होता है। इसीलिए तो रघुवीर सहाय कहते हैं “कविता उस बात को कहेगा जो तमाम लोगों के भीतर रचनात्मक ऊर्जा को एकत्रित करें7 फिर जनता तय करेगी वह उस रचनात्मक ऊर्जा को किस प्रकार उपयोग करना है। वह सत्ता के विरुद्ध संघर्ष कर सकती है, उस पर व्यंग्य कर सकती है या और कुछ। यह काम जनता का है कवि का नहीं। कवि का काम है बस जनता की सुप्त शक्ति को जागृत करना। यही है सच्चे अर्थ में एक कवि का संघर्ष।

 

जो अपनी कविता में सीधा सीधा संघर्ष दिखला देने में ही अपनी सार्थकता देखते हैं, वे जरूर किसी ना किसी विचारधारा को अपने पर गिलाफ की तरह चढ़ाए होते हैं। अगर जीवन सिंह के अनुसार नागार्जुन की भावुकता में शक्ति संपन्नता है तो इसे यह अर्थ जरूर निकलता है कि वह किसी किसी विचारधारा को गिलाफ की तरह चढ़ाए हुए हैं। विचारधारा को गिलाफ की तरह चढ़ाने वाले कवियों में स्वविवेक बहुत ही कम होता है। हर मायने में स्वविवेक विचारधारा से बहुत बड़ा होता है और यह स्वविवेक हम रघुवीर सहाय में पाते हैं। इस स्व विवेक को एक दिक्कत बताते हुए राजेश रेड्डी ने लिखा है रघुवीर सहाय की दिक्कत यह है कि उनका आत्म संघर्ष अक्सर स्वविवेक से ही तय होता है, किसी विचारधारात्मक आधार पर नहीं। और उन्होंने आगे रघुवीर सहाय की कविता में विचारधारात्मक आधार को खोजने की चेष्टा की है और इसको प्रमाणित करने के लिए रघुवीर सहाय के कुछ वक्तव्य को उद्धरण के रूप में प्रस्तुत किया है जैसा कि कोशिश तो यही रही है कि सामाजिक यथार्थ के प्रति अधिक से अधिक जागरूक रहा जाए और वैज्ञानिक तरीके से समाज को समझा जाए इस संदर्भ में शमशेर बहादुर सिंह का यह कहना बखूबी याद रहेगा कि जिंदगी में तीन चीजों की बड़ी जरूरत होती है- ऑक्सीजन, मार्क्सवाद और अपनी शक्ल जो हम जनता में देखते हैं।8 राजेश रेड्डी इस वक्तव्य को उद्धृत तो करते हैं पर आगे उन्होंने क्या कहा है उसे उद्धृत नहीं करते। आगे रघुवीर सहाय ने यह कहा है किमगर मार्क्सवाद को गिलाफ की तरह चढ़ाया नहीं जा सकता9 हिंदी के कुछ आलोचकों के साथ दिक्कत ये है कि वे जो कहना चाहते हैं, उसे सिद्ध करने के लिए किसी साहित्यकार का आधा वक्तव्य या आधी कविता उद्धृत कर देते हैं। पूरे वक्तव्य या पूरी कविता को पढ़ समझ कर निष्कर्ष निकालना नहीं चाहते। यहां पर राजेश रेड्डी ने ऐसा ही कुछ किया है। इसका एहसास रघुवीर सहाय को था; इसलिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि किसी भी रचना की जांच के लिए उसके अंदर जाना चाहिए, उसके बाहर नहीं।

 

इसलिए रघुवीर सहाय किसी विचारधारा के आधार पर किसी रचना का सृजन करने या उसका मूल्यांकन करने के घोर विरोधी थे। वे किसी भी विचारधारा को नकारते नहीं परंतु उससे यंत्रवत स्वीकार भी नहीं करते। उसमें से वह बार-बार कुछ नया खोजने की चेष्टा करते हैं। यह नयापन स्व-विवेक की ही ऊपज है और यही नयापन ही साहित्यकारों में रचनात्मकता को जागृत करता है।  इसी स्व-विवेक से अर्जित रचनात्मकता को हम रघुवीर सहाय में पाते हैं; किसी विचारधारा से उत्पन्न रचनात्मकता में नहीं। यही है उनकी रचनात्मकता का संघर्ष जहां कोई नाटकीयता, रूमानियत के लिए जगह नहीं है। इस मायने में वे नागार्जुन से भी भिन्न दिखते हैं। यही है उनकी कविता की राजनैतिक-चेतना जो दूसरों से उन्हें एकदम अलग करती है।

 

वे जनता में रचनात्मक ऊर्जा जगाना चाहते हैं और उनमें एक नए समाज को बनाने की समझ भी है। यह समझ मनुष्य और मनुष्य में सही रिश्ते कायम करने की समझ है। रघुवीर सहाय ने एक साक्षात्कार में कहा हैएक नए समाज की समझ बनाना मेरा उद्देश्य रहा है और यह भी कि उसके बनाने के साधन क्या हो सकते हैं। इस उद्देश्य के लिए समाज के घटकों के परस्पर संबंध; भूगोल, इतिहास, प्रकृति से उत्पादन कर्म के संबंध और उत्पादन के साधन पर लोकतंत्रीय नियंत्रण से लेकर अनुभवों की संवेदनशीलता तक में परिवर्तन करना मेरा उद्देश्य है। कविता मेरे पाठक को अगर दूसरे मनुष्य के साथ अपनी संवेदना के रिश्ते सुधारने की समझ देती है तो वह समाज को बदलने की समझ ही है10 सही अर्थ में कविता वही है जो लोगों की समझ बनाती है; एक नए समाज बनाने की प्रेरणा देती है, वह कोई निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं करती। निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाली जनता होती है, कविता नहीं, कवि नहीं। अगर कवि ऐसा करता है तो वह किस मायने में सत्ता, जो आदेश देती है; उससे अलग होगा। एक दूसरे संदर्भ में रघुवीर सहाय के समकालीन श्रीकांत वर्मा ने कहा था कि “मैं लोगों को राय देने वाला कौन हूं क्योंकि हर एक को अपने फैसले लेने होते हैं11

 

अतः कवि या लेखक को यह चाहिए कि वह अंतिम निर्णय न बता कर लोगों की समझ का दायरा बढ़ाए। राजेश रेड्डी को यह बात समझने में कहीं कुछ कमी रह जाती है जिसके कारण वे लिखते हैं कि “रघुवीर सहाय में निष्कर्ष से ज्यादा संशय है12

रघुवीर सहाय लोगों में समझ पैदा करने के लिए उनकी नाकामी, निराशा, निष्क्रियता, संशय को आधार के रूप में ग्रहण करते हैं। एक कविता में वे लिखते हैं -

 

 

लोग कुछ नहीं करते हैं जो करना चाहिए

तो, लोग करते क्या हैं

यही तो सवाल है कि लोग करते क्या हैं

लोग सिर्फ लोग, तमाम लोग, मार तमाम लोग

लोग ही लोग हैं चारों तरफ लोग, लोग, लोग

मुंह बाए हुए लोग और आंखें चुंधियाए लोग

कूढ़ते हुए लोग और बिराते हुए लोग

खुजलाते हुए लोग और सहलाते हुए लोग

दुनिया एक बजबजायी हुई सी चीज हो गई है।13

 

इस कविता को पढ़ते हुए क्या सिर्फ यह मान लिया जाए कि इसमें निराशा है, हताशा है, जनता के प्रति विरोध है। नहीं इसमें निराशा एकदम नहीं है; निराशा जैसा दिखने वाला एक संशय है। साथ साथ कर्म की ओर प्रेरणा भी। रघुवीर सहाय निराशा के घोर विरोधी थे। उन्होंने कहा है कि  “मैं यह मानता नहीं कि आप निराशा को एक जीवन दर्शन बनाकर कोई भी रचना कर सकते हैं या कोई भी ऐसा काम कर सकते हैं जो रचना के तुल्य हो”।14 जो यह समझता हो कि निराशा से रचना संभव नहीं है, वह कैसे अपनी कविता में निराशा, हताशा भर सकता है। कहीं ना कहीं यह पाठक की समझ की कमी है कि वह कविता के अर्थ को सही-सही पकड़ने में असमर्थ हो रहा है। जब वे लोगों को चुंधियाए लोग, मुंह बाएं लोग, कूढ़ते हुए लोग, बिराते हुए लोग बोलते हैं तो यहां निराशा से ज्यादा संशय दिखता है कि लोग ऐसे क्यों हैं। इसके पीछे क्या कारण है और जब वह कहते हैं कि लोग कुछ नहीं करते हैं जो करना चाहिए तो इसमें कहीं ना कहीं कर्म की ओर बढ़ने का संकेत है। अतः उनकी कविताएं जो निराशा से ग्रस्त लगती है, उनमें संशय और कर्म का मिश्रण है। राजेश रेड्डी ने यहां रघुवीर सहाय को बिल्कुल सही समझा है जब वे लिखते हैं “इसे लक्ष्य किया जाना जरूरी है कि उनकी निराशा उनकी समकालीनों से भिन्न है। इसमें कुछ भी नहीं हो सकने वाला श्रीकांतीय निराशा भाव नहीं है। बल्कि इस कुछ को बदला जाना चाहिए, पर यह बदल नहीं रहा है, इसे बदलने वाली शक्तियां निष्क्रिय हैं या बेईमान हो गई हैं, वाला भाव अधिक है। इस प्रकार बदलाव के हर शक्ति के प्रति उनका संदेह बना रहता है। लेकिन उनकी कविता निष्क्रियता की ओर नहीं ले जाती; बल्कि सक्रियता की दरकार रखती है15 इनकी कविता में निराशा रूपी निष्क्रियता नहीं है; आशा रूपी सक्रियता है। इसमें जो संशय, कर्म और सक्रियता है वे जनता को एक विकल्प संसार रचने के लिए प्रेरित करते हैं। वे खुद एक विकल्प संसार का सृजन नहीं करते। कुछ आलोचक इसे रघुवीर सहाय की सीमा के रूप में देखते हैं। परंतु यह उनकी सीमा नहीं उपलब्धि है। कविता कोई एक विकल्प संसार रचने का दावा नहीं कर सकती ना उसको जनता के बारे में फैसला लेने का अधिकार है बाइबल में कहा गया है कि तुम फैसला मत दो क्योंकि तुम पर फैसला दिया जाएगा। कविता की नैतिकता का तो यही मूल मंत्र है16 इसलिए वे समाज के बारे में कोई फैसला नहीं देते, खुद कोई विकल्प संसार की बात नहीं करते, विकल्प की समझ अवश्य जनता में पैदा कर आते हैं। यही उनकी कविता की सबसे बड़ी खूबी है।

 

लोगों की समझ बनाने के क्रम में, एक विकल्प संसार रचने के क्रम में वे लोगों पर प्रहार तो करते हैं, उनकी नाकामी पर क्रोधित तो होते हैं, उनकी तीखी आलोचना तो करते हैं, साथ-साथ खुद कभी कभी आत्मालोचन, आत्म संघर्ष की ओर बढ़ते भी दिखाई देते हैं। यद्यपि यह मुक्तिबोध के आत्म संघर्ष की तरह नहीं हो पाता तथापि इसमें अपने आत्म संघर्ष के बहाने लोगों में समझ उत्पन्न कराना चाहते हैं। वे बार-बार अपने को तोड़ते हैं, कुछ नए, कुछ अच्छे के सृजन के लिए।

 

अपनी एक मूर्ति बनाता हूं और ढहाता हूं

और आप कहते हैं कि कविता की है

क्या मुझे दूसरों को तोड़ने की फुर्सत है। (नेता क्षमा करें)17

 

वे बार-बार अपनी मूर्ति को तोड़ते हैं; बार-बार अपने में उन्हें कुछ खोट नजर आती है और वे उसे सुधारने की कोशिश करते रहते हैं। इसलिए उनकी रचना में बार बार एक बदलाव परिलक्षित होता है। इससे एक खूबी के रूप में प्रस्तुत करते हुए अशोक वाजपेयी लिखते हैं “यहीं एक सच्चे कवि का क्रांतिकारी से भेद भी स्पष्ट हो जाता है। क्रांतिकारी की चिंता दूसरों को बदलने की होती है जबकि कवि स्वयं अपने को बदलना चाहता है। बहुत हद तक समकालीनों की तुलना में रघुवीर सहाय इस अनूठी उपलब्धि में एकांतिक ही हैं। पर ऐसे जिनके बारे में यह कहना उपयुक्त होगा कि वह एक ऐसे अकेले थे जो दूसरों को कम अकेला बनाते हैं”।18 वह खुद अकेले बनते हैं, किसी एकांत के कोने में अपने को डाल देते हैं, दूसरों को अकेलेपन से दूर करने के लिए और मनुष्य मनुष्य के बीच सच्चे रिश्तो को कायम करने के लिए। इसके लिए वे पहले मनुष्य के अंदर छिपे कायर जो बुर्जुआ लोकतंत्र की देन है, को तोड़ना चाहते हैं और आत्मालोचन की ओर बढ़कर पहले अपना कायर तोड़ना चाहते हैं।

 

कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा

ना टूटे तिलिस्म सत्ता का

मेरे अंदर एक कायर टूटेगा

मेरा मन टूट एक बार सही तरह

अच्छी तरह टूट, झूठमुठ ऊब मत रूठ

मत डूब सिर्फ टूट।              (आत्महत्या के विरुद्ध)19

 

तिलिस्मी सत्ता को तोड़ने से पहले, मनुष्य की कायरता को तोड़ना चाहते हैं। उनको बखूबी पता है कि जब तक मनुष्य में कायरता रहेगी तब तक सत्ता का तिलिस्म भी नहीं टूटेगा। अतः पहले मनुष्य की कायरता को तोड़ने की जरूरत है। कुछ होगा, कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा; जब बोलते हैं तो इसमें एक आत्मविश्वास झलकता है और जब वह कहते हैं कि मेरा मन टूट एक बार सही तरह अच्छी तरह टूट, झूठमुठ ऊब मत रूठतो वे उन कवियों के प्रति प्रहार भी करते हैं जो जनता के प्रति सहानुभूति दिखाते हैं; एक दुखी संसार रचते हैं। जैसे कह रहे हों कि हम आपके लिए कितने दुखी हैं। पर रघुवीर सहाय में कहीं भी इस तरह का मगरमच्छ रुदन नहीं है। वे जनता के लिए जितना दुखी होते हैं उससे ज्यादा उसे तोड़ना चाहते हैं; उसकी कायरता को तोड़ना चाहते हैं। जिसके बिना जनता कभी भी सत्ता के शोषण से मुक्त नहीं हो सकेगी और उनमें निराशा नहीं, आत्मविश्वास बोलता है कि इस कायरता के टूटने से जरूर कुछ होगा। एक ना एक दिन जनता शोषण मुक्त होगी।

 

निष्कर्ष :

इस प्रकार रघुवीर सहाय की कविता आरंभ से लेकर अंत तक एक आत्मविश्वास को लेकर चलती है और विश्वास को सच्चाई में बदलने के लिए हर तरह से लड़ती है। उनकी कविता की राजनीति में दूसरों को उनके अधिकार प्राप्त कराना है। इस राजनीतिक चेतना के तहत उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से एक नया, शोषण मुक्त, सुंदर जीवन जीने की राह दिखलाई है।

 

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1.     शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-1; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 38

2.     शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-1; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 38

3.     शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-3; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 401

4.     शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-3; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 480

5.     शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-3; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 480

6.     कृति ओर (अप्रेल-जून 1999) पृ॰ 26

7.     शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-3; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 468

8.     आलोचना (अक्तूबर-दिसंबर 1989) पृ 13

9.     शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-1; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 68

10. शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-3; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 473-474

11. त्रिपाठी, अरविंद – श्रीकांत वर्मा रचनावली- भाग-4; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 383

12. आलोचना (अक्तूबर-दिसंबर 1989) पृ 09

13. शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-1; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 94

14. शर्मा, सुरेश - रघुवीर सहाय रचनावली- भाग-3; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 405

15. आलोचना (अक्तूबर-दिसंबर 1989) पृ 15

16. वाजपेयी, अशोक – कवि कह गया ; भारतीय ज्ञानपीठ , नई दिल्ली- 3 पृ॰ 104

17. सहाय, रघुवीर – आत्महत्या के विरुद्ध; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 32

18. वाजपेयी, अशोक – कवि कह गया ; भारतीय ज्ञानपीठ , नई दिल्ली- 3 पृ॰ 92-93

19. सहाय, रघुवीर – आत्महत्या के विरुद्ध; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली -2   पृ॰ 85

 

 

 

Received on 06.06.2020          Modified on 16.06.2020

Accepted on 28.06.2020            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(2):118-122.